काव्य -कलश
नव प्रभात है ! सादर वंदन
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सुप्रभात सुखमय हो जीवन
नव विहंग पुलकित है तन-मन
विसरादो बीते कलुषित पल
नव प्रभात है ! सादर वंदन।

मंगल बेला  शुभ घडी आई
नित नूतन खुशियां संग लाई
नव विचार सृजित हों हर पल
नव प्रभात है ! सादर वंदन।

शुभ सोचो शुभ को ही ध्याओ
शुभ संग अपनी प्रीति बढाओ
शुभ भावों से करो आचमन
नव प्रभात है ! सादर वंदन।

समय चक्र नित घूम रहा है
सजग रहो यह बोल रहा है
स्वर्ण ताप में बनता कुंदन
नव प्रभात है ! सादर वंदन।

'अखिल' भारती का है कहना
सजग आत्मा में तुम रहना
बन जाओ प्रभु के लघु नंदन
नव प्रभात है ! सादर वंदन।
          
----जर्नलिस्ट डा.अखिल बंसल